सोमवार, 1 जून 2009
महंगी बसें और ये हाल
डी टी सी की हरी वाली बसों को देख के बड़ा ही दुख होता है एक तो ये बसें इतनी महँगी है और इसके बावज़ूद भी उनका बिलकुल भी ध्यान नहीं रखा जाता उन बसों पर इतनी धुल जमी रहती है की देख के हमारा हंस रोता है की डी टी सी को इसी बस खरीदने की क्या जरूरत पड़ी थी जिनमे एक तो इतना पैसा बर्बाद होता है दूसरा गर्मियों में हवा भी नहीं आ पाती जिसके कारण कई बार बसों में आग भी लग जाती है जबकि इन बसों के बदले यदि डी टी सी दूसरी वाली बसें खरीदती तो ऐसी दो बसें खरीदी जा सकती थी मुझे लगता है इस बारे में परिवहन विभाग को सोंचना चाहिए
शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009
हिन्दी बनाम अंग्रेज़ी
हमारे कोलेजों में जो एम.ए और बी .ए स्तर पर पढ़ाई होती है, उसमे केवल हिन्दी और संस्कृत को छोड़ कर लगभग बाकी सभी का माध्यम अंग्रेज़ी में ही है और अधिकतर टीचर्स भी इंग्लिश में ही पढ़ते - पढाते हैं क्योंकि इससे उन्हें सुविधा होती है ऐसा उनका मानना है पर इस बात पर कोई भी ध्यान नही देता कि जो छात्र - छात्राएं हिन्दी माध्यम से हैं , क्या उन्हें इन टीचर्स कि बात पूरी तरह से समझ आती है ? या उन्हें क्लास में और उसके बाहर भी कितनी मेहनत करनी पड़ती है और यहाँ तक की मेहनत करने के बाद भी उन्हें न तो अच्छे नम्बर ही मिल पाते हैं और न ही इन कम नम्बरों की वजह से वे कहीं दाखिला ही ले पाते है ऐसे में उन छात्र - छात्राओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो जाता है मुझे लगता है कि अध्यापको को इस बात पर ध्यान देना चाहिए और यदि सम्भव हो सके तो , या तो ख़ुद ही कुछ किताबे हिन्दी में छात्रों के लिए लिखनी चाहिए या अंग्रेज़ी से अनुवाद करना-करवाना चाहिए जिससे कि छात्रों कि समस्याएं कुछ कम हो सकें
रविवार, 16 नवंबर 2008
जनता और चुनाव
जैसे जैसे चुनाव आने लगे हैं वैसे वैसे नेताओं के तेवर भी बदलने लगे हैं जहाँ पहले वे जनता पर धयान भी नही देते थे वहीं अब हमारी बेचारी जनता पर उन्हें कुछ जरुरत से ज्यादा प्यार आने लगा है चुनाव नजदीक क्या आते हैं नेताओं के व्यवहार में एक बड़ी तबदीली देखने को मिलती है अचानक से जनता के प्रति प्रेम उभर जाता है , उनकी समस्ये दिखाई देने लगती हैं , और कुछ नही मिलता तो उनके घरो तक पहुच जाते हैं लेकिन शायद वो ये भूल जाते हैं की हम लोग इतने बेवकूफ भी नही हैं जितना की वो हमें समझते हैं इसलिए अब उन्हें या तो सावधान होकर काम करना होगा या हमे फंसाने के लि नै चाले सोचनी पड़ेंगी
मंगलवार, 11 नवंबर 2008
स्त्री शिक्षा और समस्या
लड़कियों के लिए आज के समय में शिक्षा जितनी जरुरी है उतना ही उसके लिए शिक्षा के केन्द्रों में पहुचना मुश्किल है , सुबह या तो बसे इतनी भरी हुई होती हैं की ड्राईवर बस रोकता ही नही है और अगर बस रोक भी लेता है तो उस बस में सफर इतना मुश्किल होता है की पूछिए मत , और जो बसों में कुछ अ - सामाजिक तत्वों द्वारा हरकते की जाती हैं वो अलग , एक लड़की के लिए इसे में शिक्षा प्राप्त करना सच में बहुत मुश्किल है ,डी टी सी को इस बारे में कुछ धयान देना चाहिए लेकिन वो तो अपने रोने ख़ुद ही रोने लगती है ,चलिए देखते हैं ये सिलसिला कब तक जरी रहता है ........
रविवार, 9 नवंबर 2008
हमऔर हमारी शिक्षा
आज सुबह जब बस में चढी तो बहुत भीड़ थी , बस में पैर रखने के लिए भी जगह नही थी एक लड़की जो मेरे पीछे खड़ी हुई थी उसे भी खड़े होने में कुछ तकलीफ हो रही थी उसे सुविधा देने के लिए मैंने थोड़ा साइड में खड़ा होकर उसे भी खड़े होने की जगह दे दी , लेकिन वो लड़की अपना बैलेंस नही संभाल पा रही थी और मेरे ही ऊपर गिरे जा रही थी तो मैंने उससे कहा की आप थोड़ा बैलेंस बना लो प्लीज , तब उस ने कहा अगर ज्यादा दिक्कत होती है तो अपनी गाडियों में आया करो और पतानी क्या क्या बोलने लगी मैंने उस से कहा की मै आपसे मेंनर्स से बात कर रही हूँ तो क्या आप मुझसे ठीक से बात नही कर सकती और बात में पूरे टाइम मै ये ही सोचती रही की हमारी ऐसी पढ़ाई का क्या फायदा जब हम किसी से ढंग से बात भी नही कर सकते क्या हम इसीलिए पढ़ते हैं की दूसरो को उल्टा - सीधा जवाब दे
सोमवार, 27 अक्टूबर 2008
सरकारी नोकर और उनका वर्चस्व
आज का दिन कुछ ख़राब रहा पहले तो बस ही देर से आई दूसरा बस ने कही और उतारने की बजाए कही और उतार दिया । लेकिन फिर भी रास्ते में हुई एक बात को देख के मुझे कुछ अजीब लगा , बात ये थी कि कुछ रिक्शा और स्कूटर वाले खड़े होकर अपनी सवारी का इंतज़ार कर रहे थे इतने में एक पुलिस अधिकारी अपने कुछ सिपाहियों के साथ वहा आया और सिपाहियों से कहा '' मार साले को ये क्या तेरा बाप लगता है जो तू इसे इतने प्यार से भगा रहा है '' ये सब बाते सुन के मुझे दुःख हुआ और लगा कि अगर इसके पास सरकारी नोकरी है भी तो क्या इसका मतलब ये है कि वो इसका गलत फायदा उठाए और लोगों को इस तरह से गलियां दे मुझे लगता है का i हमें इस बारे में सोचना चाहिए , क्या आपको नहीं लगता ................................. ???
गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008
आत्महत्या और युवा
आत्म हत्या आजकल एक फैशन बनता जा रहा है , ऐसे लोग जो अपनी परेशानियों को झेल नही सकते वे बिना कुछ सोंचे -समझे इस और अपने कदम बढ़ा देते हैं । किसी समय में लोगों को इतनी परेशानियाँ झेलनी पड़ती थी पर वे उनसे घबराते नही थे पर आजकल न जाने हमारे युवाओं को क्या होता जा रहा है .......... युवा तो जोशीले और गर्म खून के नाम से जाने जाते हैं परन्तु आज कल हर अख़बार में रोज ये ही देखने और पढने को मिलता है की किसी स्कूल के छात्र ने फ़ैल होने के कारण आत्म हत्या कर ली तो किसी ने किसी के कुछ कहने से बुरा मानने के कारण अपने प्राणों को गवा दिया है ,कही किसी को उसकी प्रेमिका या प्रेमी ने प्रेम प्रस्ताव ठुकरा दिया तो कही आर्थिक तंगी के कारण किसी ने अपनी जान देदी । अगर हमारे देश के युवा ही ऐसे करेंगे तो देश के भविष्य का क्या होगा और किसी को भी बना बनाया रास्ता तो नही मिल जाता सबको अपना रास्ता ख़ुद ही बनाना पड़ता है इसलिए हमे उनसेसे डरे बिना उनसे सिख ले कर आगे बढ़ना चाहिए न की प्रेषण होकर अपने अमूल्य जीवन को खतम करना चाहिए ।
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